Khatu Ke Shyam Ji

श्री श्याम प्रभु खाटु वाले का परिचय

भक्त प्रेमियों श्याम बाबा कौन हैं ? यह प्रश्न कई लोगों के मन में जिज्ञासा बनाए हुए है । श्री श्याम प्रभु के बारे में संक्षिप्त जानकारी देने का प्रयास श्री श्याम सखी मण्डल, रायगढ़ (छ.ग.) द्वारा किया जा रहा है ।

Khatu Ke Shyam Ji

Khatu Ke Shyam Ji

यह द्वापर युग के महाभारत काल की घटना है । पाण्डव कुलभुषण बर्बरीक बचपन से ही बड़े बलशाली एवं दानवीर थे। इन्हें देवाधिदेव महादेव एवं जगत जननी जगदम्बा का प्रत्यक्ष आशीर्वाद प्राप्त था । बर्बरीक इनके परम भक्त थे । इनके आशीष से इन्हें तीन दिव्य बाण प्राप्त हुए जिनसे वे सारे त्रिलोक का संहार कर सकते थे। उस समय कौरव व पाण्डव का महाभारत का युद्ध शुरु होने वाला था । उस युद्ध को देखने की लालसा लिये माता का आशीर्वाद ले बर्बरीक अपने घोड़े लीला पर सवार होकर (इसलिये इन्हें लीले का असवार भी कहा जाता है) कुरुक्षेत्र के लिये निकल पड़े । कौरवो ने पाण्डवों के साथ हमेशा छल किया । कपट से जुए में सब कुछ छीन लिया और बारह वर्ष वनवास एवं एक वर्ष अज्ञातवास के लिए मजबुर कर दिया । बराबर के हिस्सेदार होने पर भी पाण्डव धर्मावलम्बी होने के कारण वन वन भटकते रहते थे । श्रीकृष्ण ने समझौते के लिये पाण्डवों का कपट से जीता हुआ आधा राज्य मांगा फिर युद्ध को रोकने के प्रयास में पाण्डवों के लिये सिर्फ पांच गांव मांगे पर अहंकार के मद में चुर कौरवों ने पांच सुई की नोक के बराबर जमीन भी देने से इंकार करते हुए पाण्डवों को युद्ध के लिये ललकारा । मजबुरन धर्म के रक्षक श्री कृष्ण ने धर्म की रक्षा के लिये महाभारत के युद्ध की घोषणा की एवं इस धर्मयुद्ध में पाण्डवों की तरफ शामिल हो अर्जुन के सारथी बनें । कौरव श्रीकृष्ण को एक मायावी छलिया गाय चरानेवाले से ज्यादा कुछ नहीं समझते थे । इस युद्ध में सिर्फ कुछ राजाओं को छोड़कर बाकी सभी राजाओं समेत स्वयं श्रीकृष्ण की चतुरंगिनी सेना एवं कर्ण जैसे योद्धा ने कौरवों की तरफ से युद्ध किया ।  किन्तु जिनके साथ धर्म हो जिसके पक्ष में स्वयं नारायण हो उन्हें कौन हरा सकता है पर उस समय पाण्डवों की जीत का संदेह अनेक लोगों सहित स्वयं बर्बरीक की माता को भी था । उन्हे अपने पुत्र की वीरता पर पुर्ण विश्वास था सो उन्होनें (खुल कर यह न कहकर की पाण्डवों का साथ देना) पुत्र से कहा युद्ध देखने अवश्य जाओ किन्तु यदि वहा युद्ध करना पड़े तो हारे का साथ देना और मातृभक्त पुत्र नें हारे का साथ देने का वचन दिया यहीं से वे ‘हारे के सहारे’ कहलाए ।

अन्तर्यामी लीलाधारी पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण को भान हो गया कि बर्बरीक युद्ध के लिये निकल पड़े हैं और कौरवों की हार निश्चित है । माता को दिये वचनों के अनुसार यदि वे कौरवों के तरफ से युद्ध कर बैठे तो अनर्थ हो जायेगा इसलिये उन्होनें लीला रची । ब्राम्हण का वेश बनाकर वे रास्ते में ही बर्बरीक से मिले उनसे कई प्रकार की बातें करते हुए उनका परिचय एवं योग्यता पुछी । बर्बरीक ने अपने बल पौरुष और दानशीलता का बखान किया । ब्राम्हण रुपी श्रीकृष्ण ने असहमति जताते हुए उनकी परीक्षा लेने की सोची । उन्होनें वहीं स्थित एक पीपल वृक्ष के सभी पत्तों को एक ही बाण से बेध कर दिखाने को कहा, जब बर्बरीक ध्यानमग्न होकर धनुष पर बाण का अनुसंधान करने लगे उसी समय प्रभु ने चुपके से एक पत्ता अपने पैरों के नीचे यह सोचकर दबा लिया कि मैं स्वयं इसकी रक्षा करके देखता हू क्या होता है । किन्तु बर्बरीक नें एक ही बाण से सभी पत्तो का भेदन कर डाला स्वयं त्रिलोकीनाथ द्वारा रक्षित पत्ता भी नहीं बच पाया । श्रीकृष्ण सारी बात समझ गये अब उन्होनें धर्म की रक्षा के लिये एक अद्भुत लीला रची जो सदैव अमर रहेगी ।

श्री कृष्ण ने बर्बरीक से दान मांगा और उनका वचन मिलने पर श्री कृष्ण ने बर्बरीक से उनके शीश को ही दान में मांग लिया । किशोर अचंभित रह गया कि यह आपने क्या मांग लिया किन्तु बड़े नम्र भाव से हाथ जोड़कर ब्राम्हण से विनती की कि आप अपना परिचय दें, आप ब्राम्हण तो नहीं हो सकते आप कौन है और आपका मेरे शीश दान मांगने का क्या प्रयोजन है कृपा कर मेरी शंका का निवारण करें । श्रीकृष्ण बर्बरीक की विनम्रता से अत्यंत प्रसन्न हुए और उनको अपने रुप का दर्शन कराया और समझाया वत्स महाभारत युद्ध में धर्म की विजय के लिये एक महा वीर की बलि चाहिये तुम पाण्डव कुल के हो अतः धर्मरक्षार्थ इस बलिदान के लिये तुम्हे सदैव याद किया जायेगा । बर्बरीक ने शीशदान से पहले प्रभु से इस युद्ध को देखने की इच्छा प्रगट की तब प्रभु ने तथास्तु कहकर योद्धा को संतुष्ट किया । तत्पश्चात सारा ब्रम्हाण्ड जैसे सन्न हो गया अब ऐसी घटना होने वाली थी जो आज से पहले न हुई थी न किसी युग में होगी । वीर महादानी बर्बरीक ने अपने आराध्य देवी देवताओं का वंदन किया एवं अपनी माता को नमन् किया फिर अपनी कटारी खींचकर एक ही झटके में अपने शीश को धड़ से अलग कर श्री कृष्ण को शीश का दान कर दिया (यही से वे शीश के दानी कहलाये) । श्री कृष्ण ने शीश को अपने हाथों में लिया एवं अमृत सिंचन कर शीश को एक अत्यंत ऊंचे टीले पर रख दिया जहां से सारी समरभूमि नजर आती थी । इस अमर शीश के कारण ही जब आप खाटू मंदिर में जायेंगे तो आपको नित नया रुप देखने को मिलेगा । किन्हीं-किन्हीं को तो इस विग्रह में भी कई बदलाव नजर आते हैं कभी मोटा, कभी पतला, कभी हंसते हुए कभी शांत भाव में और कभी ऐसा तेज लिये की नजर ही न टिके । प्रसंगवश ये बातें लिखने से न रह जायें अतः यहीं लिख दी । 

प्रेमियों युद्ध शुरु हुआ – अमरत्व प्राप्त शीश दृष्टा मौन होकर उस अद्वितीय युद्ध एवं श्री प्रभुलीला को अपलक निहार रहा था । धर्म-अधर्म की आॅंख मिचैली निरंतर जारी थी । युद्ध का अंत हुआ जिसमें पाण्डव विजयी हुए । विजय के अहंकार ने पाण्डवों की मति भी बदल दी, सभी आत्म प्रशंसा में लीन हो गये ।  अर्जुन अपने गाण्डीव का, युधिष्ठिर अपने भाले का नकुल सहदेव अपनी तलवार का और भीम अपनी गदाकौशल का बखान कर रहा था मतान्तर होने पर सभी निर्णय के लिये वासुदेव श्रीकृष्ण के पास पहुचे । श्री कृष्ण ने कहा मैं तो स्वयं युद्ध में व्यस्त था आपमें से किसने क्या पराक्रम दिखाया देख नहीं पाया । उन्होनें बर्बरीक के पास चलने को कहा कि वह ऊंचे टीले पर बैठा सबकुछ देख रहा था । तब तक पाण्डवों को बर्बरीक शीशदान की घटना का ज्ञान भी नहीं था । श्रीकृष्ण नें बर्बरीक से पाण्डवों के पराक्रम के बारे में पुछा तो शीश ने उत्तर दिया प्रभु पुरे युद्ध में तो आपका सुदर्शन चक्र नाच रहा था और माँ जगदम्बा खप्पर भर-भर कर लहु का पान कर रही थी ये तो मुझे कहीं नजर ही नहीं आए । बर्बरीक के उत्तर को सुनकर पाण्डवों को सत्यता का ज्ञान हुआ, उनकी नजरे नीची हो गई और मुस्कुरा रहे थे द्वारिकाधीश श्रीकृष्ण बर्बरीक का धर्मानुकुल निर्णय सुनकर । श्री कृष्ण नें पाण्डव कुलभुषण बर्बरीक से सभी का परिचय कराया । ( अस्कंध पुराण के अनुसार बर्बरीक महाबली भीम के पौत्र एवं वीर घटोत्कच के पुत्र हैं )  

पाण्डवों को दिये निर्णय से खुश होकर श्रीकृष्ण ने इन्हें अपना नाम, अपनी कलायें एवं अपनी शक्तियां प्रदान की और आशीर्वाद प्रदान करते हुए प्रभु का स्वर गुंजा हे बर्बरीक तुम जैसा दानी न तो आज तक हुआ है न ही होगा, माता को दिये वचनों के अनुसार तुम हारे के सहारे बनोगे कलयुग में तुम मेरे श्याम नाम से घर-घर में पूजे जाओगे । कल्याण की भावना से सच्चे मन से तुम्हारे दरबार में जो भी लोग आयेंगे और जो भी मांगेगे वे खाली झोली लेकर नहीं जायेंगे तुम्हारे दर पर उनकी सभी मनोकामनायें पूर्ण होगी । 

कालान्तर में कलयुग में बर्बरीक का यही शीश राजस्थान के सीकर जिले की खाटू नगरी में प्रगट हुआ (इस कारण वे कलयुग अवतारी कहलाये) । जिस स्थान पर शीश प्रगट हुआ आज वहा एक अद्भुत कुण्ड है जो श्री श्याम कुण्ड के नाम से विख्यात है । यहाँ भी कई चमत्कार हुए हैं श्रद्धा भाव से कुण्ड में स्नान करने से कई रोगों का निवारण हुआ है । जिसके पश्चात खाटूनगरी में मंदिर बनाकर कार्तिक सुदी एकादशी श्री श्याम शीश की स्थापना हुई ।

प्रेमियों समस्त देवी-देवताओं का पूजन फलदायक होता है । किन्तु ऐसी मान्यता है कलयुग अवतारी होने एवं श्री कृष्ण के वरदान के कारण श्री श्याम जी के दरबार में सुनवाई जल्दी होती है । अतः लोग यहां उमड़ रहें है एवं लगातार उनके भक्तों की संख्या व आस्था बढ़ रही है । यदि उनकी भावनायें सजीव न होती तो कब तक लोग आते । आर्थिक युग में अर्थ की प्रधानता है और धन-दौलत तो बाबा दोनों हाथो से लुटा रहा सो श्री श्यामप्रभु को लखदातार भी कहा जाता है ।

तीन बाण धारी की – जय-जय-जय  हारे के सहारे की  – जय-जय-जय  शीश के दानी की  – जय-जय-जय   कलयुग अवतारी की – जय-जय-जय   लीले के असवार की – जय-जय-जय  लखदातार की – जय-जय-जय

Source:- http://shrishyamsakhi.com


 

Jai Shyam Baba …!Khatu, Rajasthan

Khatu Ke Shyam Baba

Khatu Ke Shyam Ji

 

The legend of Shyam Baba can be traced back to the medieval Mahabharata. Barbareek was the son of the great Pandava brother – Bhim and Nag Kanya – Ahilawati. Barbareek, from his childhood was very brave and a great warrior. He learnt the art of fighting from his mother. Lord Shiva, pleased with him, gave him the three infallible Arrows (Teen Baan) and Agni Dev (Fire God) gave him the Bow, which would make him victorious in the three worlds.

The battle of Mahabharata was inevitable between the Pandavas and Kauravas, and having got the news, Barbareek wanted to witness the great war. He promised to his mother, that if he felt the urge, to participate in the battle, he would join the side which would be losing. He rode on the Blue Horse (Leela Ghora) equipped with the three arrows and the bow. The omnipresent Lord Krishna, disguising himself as a Brahmin, stopped Barbareek to examine his strength. He even tried to mock Barbareek saying that he was going to the great battle with only three arrows.

On this, Barbareek replied that only one arrow was enough to destroy all the enemies in the war, and it would then return to his quiver. If all the three were used, it would create havoc in the three worlds. Lord Krishna challenged him to tie all the leaves of the peepal tree under which he was standing, with one arrow. Barbareekaccepted the challenge, removed one arrow from his quiver and released it from his bow.

The arrow tied all the leaves together within moments. But Lord  Krishnahad one leaf under his foot. The arrow then started revolving around his foot, and he asked the boy, whom would he favour in the war. Barbareek reiterated that he would fight for the side which loses. Lord Krishna knew that defeat of Kauravas was inevitable, and if this vrave boy joins them, the result would be in their favour.

The Brahmin (Lord Krishna) then wanted charity from the boy. Barbareek promised him anything he wished. Lord Krishna asked him to give his head in charity. The boy was shocked, but he maintained his promise. He requested the Brahmin to disclose his identity. Lord  Krishna showed him his divine form.

He explained to Barbareek that before the battle, in order to worship the battlefield, head of the bravest Kshatriya needs to be sacrificed. And he considered Barbareek to be the bravest, and hence asked for his head in charity.

Barbareek requested that he wanted to see the battle till its end, and his wish was granted. Thus on the12th day of Shukla Paksha of Falgun month, he gave his head to Lord Krishna (SHISH DAAN). The head was placed atop a hill near the battlefield from where, Barbareek could watch the whole battle.

When the battle was over and Pandavas having won, they argued amongst themselves as who was responsible for victory. At this, Lord  Krishna suggested that Barbareek’s head had watched the whole battle, and who else would be a better judge. Barbareek’s head suggested that it was Lord Krishna who was responsible for the victory, his advice, his presence, his gameplan had been crucial. He could see only the Sudarshan Chakra revolving around the battlefield which was hacking the Kaurava army to pieces and Draupadi assuming the fearful form of Mahakali Durga was drinking bowl after bowl of blood and was not allowing even one drop of blood to fall on the earth.

Lord  Krishna, pleased with Barbareek’s great sacrifice, granted him the boon that when Kaliyug descends, he would be worshipped by the name of Shyam in his form. His devotees would be blessed just by pronouncing his name from the bottom of their hearts.

His head was then buried in Khatu. Milk started to flow out of a cow’s udder when she reached the spot. Later, the place was dug up, and the head appeared. The head was handed over to a Brahmin who worshipped the head for many days. The King of Khatu had a dream where he was inspired to build a temple and install the head. Subsequently, a temple was built and the head “SHISH” was installed on the 11th day of Shukla Paksha of Kartick month.

Khatu town is situated in the Sikar Dist., Rajasthan, India. Shyamji’s temple, constructed of the famous Makrana marble, lies in the heart of the town. Lord Shyamji is considered to be the God of the Kaliyug (The present age where sin and wrongdoing is at its maximum.) Shyamji is synonymous with Lord Krishna and thus, he is worshipped in the same form also.


FESTIVALS

1.फाल्गुन महोत्सव:-

यह उत्सव फाल्गुन माह में शुक्ल पक्ष नवमी से द्वादशी तक चार दिवसीय मनाया जाता है यह वार्षिक लक्खी मेला है इस मेले में देश-विदेश से 25-30 लाख श्रद्धालू पूजा-अर्चना के लिये आते है। 

2.श्याम जयन्ती उत्सव:-

यह उत्सव कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी को श्री श्याम प्रभू के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। इस दिन सम्पूर्ण मंदिर का विशेष श्रृंगार एवं छप्पन भोग लगाया जाता है।

3.झूलामहोत्सव:-

श्रावण मांस की एकादशी को श्री श्याम प्रभू का झूलामहोत्सव मनाया जाता है सम्पूर्ण मंदिर के हरित फूल एवं पतियों से श्रृंगार किया जाता है इसमें भगवान श्री कृष्ण की बाल लीला से रास एवं कर्मयोग की सभी तरह की झांकियां प्रदर्शित की जाती है।


Salasar ke Balaji in USA – only at:

Sunnyvale Hindu Temple,

420 Persian Drive, Sunnyvale, CA 94089